देहरादून: कभी अपनी शांति और सुरक्षित वातावरण के लिए पहचानी जाने वाली Dehradun की दून घाटी आज चिंता और असुरक्षा का पर्याय बनती जा रही है। Brigadier (Retd.) वी. के. जोशी की मॉर्निंग वॉक के दौरान हुई दर्दनाक हत्या की घटना अभी लोगों के मन से उतरी भी नहीं थी कि राजपुर–ओल्ड मसूरी रोड, शहंशाही आश्रम के पास देर रात हुई फायरिंग ने हालात की गंभीरता को और उजागर कर दिया।
रात करीब 3 बजे चली गोलियां एक रिहायशी सोसाइटी के फ्लैट में जा घुसीं। सौभाग्य से कोई घायल नहीं हुआ, लेकिन इस घटना ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है—
क्या अब अपने घर भी सुरक्षित नहीं रह गए हैं?


⚠️ दून की बदलती तस्वीर
जो दून घाटी कभी सुकून और सादगी का प्रतीक थी, वह अब अनियंत्रित विकास और बढ़ते अपराधों के चलते अपनी पहचान खोती जा रही है।
- जगह-जगह बढ़ते शराब के ठेके
- अवैध खनन की गतिविधियां
- बिना योजना के हो रहा निर्माण
ये सभी संकेत हैं कि हालात धीरे-धीरे नियंत्रण से बाहर होते जा रहे हैं।
🔍 सुरक्षा व्यवस्था पर उठते सवाल
लगातार हो रही घटनाएं साफ बताती हैं कि कानून व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है। जब प्रशासन की पकड़ कमजोर होती है, तो अपराधियों के हौसले खुद-ब-खुद बढ़ जाते हैं।
पहले कहा जाता था— “रात में बाहर निकलना सुरक्षित नहीं”
अब लोग कहने लगे हैं— “घर के अंदर भी भरोसा नहीं”
🧭 जिम्मेदारी तय कौन करेगा?
यह स्थिति केवल पुलिस की विफलता नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कमजोरी को दर्शाती है।
- कमजोर नीतियां
- ढीली निगरानी
- जवाबदेही की कमी
सरकार को समझना होगा कि अनियोजित विस्तार और अवैध गतिविधियों पर ढिलाई समाज के लिए खतरा बन रही है।
📢 अब चुप रहना खतरे से खाली नहीं
दून के नागरिकों को अब जागरूक और मुखर होना होगा। यह समय सिर्फ चिंता जताने का नहीं, बल्कि ठोस कदम उठाने की मांग करने का है।
अगर आज भी चुप्पी बनी रही, तो हालात और बिगड़ सकते हैं।
❓ एक जरूरी सवाल
क्या हम आने वाली पीढ़ियों को एक डर और असुरक्षा से भरा शहर देना चाहते हैं?
या फिर मिलकर दून को फिर से वही सुरक्षित और शांत शहर बनाना चाहेंगे?
दून घाटी एक अहम मोड़ पर है—
अब फैसला जनता के हाथ में है।